कार्पोरेट




कम्पनी वित्त-पोषण
देना बैंक निर्माण, व्यापार व सेवा की विभिन्न गतिविधियों में लगे व्यावसायिक संस्थानों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराता है । यह आर्थिक सहायता नई परियोजनाएँ लगाने, सम्पत्तियों का अधिग्रहण करने और घटकों की दैनिक कार्यकारी पूंजी की ज़रूरतें पूरी करने के लिए भी उपलब्ध कराई जाती है । इन सहायताओं को क्रमश: दीर्घ-कालिक आर्थिक सहायता और अल्प-कालिक आर्थिक सहायता कहा जाता है ।

सावधि ऋण
सावधि ऋण/आर्थिक सहायता में उत्पाद के साधन, जैसे ज़मीन, मकान और संयत्र व मशीनें, इत्यादि अधिग्रहित करने के लिए धन-राशि कवर की जाती है । ये नई परियोजनाएं लगाने या वर्तमान गतिविधियों में विस्तार करने के लिए हो सकती हैं । सावधि आर्थिक सहायता आमतौर पर दीर्घ-कालिक अवधि के लिए दी जाती है और इनकी चुकौती, निर्धारित अवधि में, ऋण-स्थगन या बिना ऋण-स्थगन के (Moratorium), किश्तों में की जा सकती है । अवधि और किश्तों का निर्धारण परियोजना/ऋण लेने वाले की चुकौती क्षमता के आधार पर किया जाता है ।

‡कार्यकारी पूंजी की आर्थिक सहायता
कार्यकारी पूंजी आर्थिक सहायता Working Capital Finance (WCF) सामान्य व्यापारिक/निर्माण-सम्बन्धी गतिविधियां जारी रखने के लिए दी जाती है । कार्यकारी पूंजी की आर्थिक सहायता अपेक्षाकृत छोटी अवधि-आमतौर पर १ वर्ष की अवधि के लिए दी जाती है और ऋण लेने वाले के कार्य-निष्पादन को देखते हुए, इसका नवीकरण वार्षिक आदार पर किया जाता है ।

WCF पर विचार, सिर्फ उस समय किया जाता है जब परियोजना लगभग पूरी हो रही हो और सावधि ऋण की ज़रूरतों को पूरी तरह ''टाई-अप'' कर किया गया हो ।

ऋण लेने वाले की कार्यकारी पूंजी की सीमाओं का मूल्यांकन विभिन्न तरीकों, जैसे अनुमानित आवर्त प्रणाली (Projected Turnover Method) (नायक समिति की सिफारिश), अनुज्ञेय बैंक आर्थिक सहायता प्रणाली (Permissible Bank Finance Method), नगद बजट प्रणाली (Cash Budget Method), इत्यादि से बैंकिंग पद्धति से आवश्यक/प्राप्त समग्र कार्यकारी पूंजी, गतिविधि की प्रवृत्ति, उत्पादन चक्र, इत्यादि के आधार पर किया जाता है ।

कार्यकारी पूंजी की आर्थिक सहायता, बिक्री-पूर्व और बिक्री के बाद की सीमाओं के रूप में होती है । बिक्री-पूर्व आर्थिक सहायता में, अग्रिम राशि उत्पादन/ प्रसंस्करण के लिए माल प्राप्त करने या व्यापार करने के प्रयोजन से दी जाती है, जबकि बिक्री के बाद की आर्थिक सहायता प्राप्तियों के आधार पर दी जाती है । देना बैंक बिक्री के बाद की आर्थिक सहायता हुंडियों की खरीद / कटौती, इत्यादि के रूप में प्रोत्साहित करता है ।

बिक्री -पूर्व आर्थिक सहायता:
१.नगद उधार दृष्टिबन्धक (Cash Credit Hypothecation) / स्टॉक बंधक (Pledge against Stocks)
२.पैकिंग उधार दृष्टिबन्धक/ स्टॉक बंधक
३.क्लीन पैंकिंग क्रेडिट लिमिट
४.ट्न्स्ट रिसीट्स
५.कार्यकारी पूंजी ऋण (मांग/साविध)
 
बिक्री के बाद की आर्थिक सहायता:

१.बिलों की कटौती/खरीद-देशी/विदेशी
२.बही ऋण पर नगद उधार दृष्टिबन्धक
३.निर्यात प्रोत्साहन पर अग्रिम
४.चेकों/डिमान्ड ड्नफ्ट्स की खरीद
 
बिना धनराशि के आधार पर उधार देने की सहायता
व्यावसायिक इकाइयों को सामान प्राप्त करने के लिए भी उधार प्राप्ति की सहायता ज़रूरी होती है, जिसके लिए धनराशि आवश्यक नहीं होती । इस तरह की सुवधिाएं आश्वस्त प्रतिबद्धता/ऋणदायी संस्थाओं की गारंटी पर उपलब्ध हैं ।

देना बैंक इस तरह की बिना धनराशि के आधार पर दी जाने वाली सहायता, सुयोग्य ईकाइयों को निम्न रूप से देता है:

१.विभिन्न प्रकार की गारंटी जारी करना, जैसे कार्य-निष्पादन, आर्थिक, बोली बांड, निविदा जमा राशि/बयाना , और
२.अप्रलेखी साख पत्र (Letter of Credit) जारी करना
३.आस्थगित भुगतान गारंटी (Deferred Payment Guarantee)

निर्यात उधारी
बैंक निर्यातकों को, शिपमेंट से पहले और शिपमेंट के बाद, दोनों ही चरणों में, प्रतिस्पर्धी दरों में उधार देती है ।

हाल ही में, बैंक ने गोल्ड कार्ड स्कीम आरंभ की है जो ऋण के लिए सुयोग्य व्यिक्तयों को सस्ती निर्यात उधारी उपलब्ध कराती है ।

निर्यात में लगे कुछ चुने हुए ग्राहकों को, विदेशी मुद्रा में मूल्यांकित निर्यात उधारी (Export Credit Denominated in Foreign Currency) अर्थात PCFC (शिपमेंट से पहले)/ REBA (शिपमेंट के बाद) के रूप में, उचित रूप से पुरस्कृत भी किया जाता है ।